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Relationship between Interest Rates and Bond Price | Interest Rates तथा Bond की कीमत के बीच रिलेशन

 

भारतीय Debt Market को आप आसान भाषा में 2 अलग-अलग श्रेणियों में रख सकते हो – लॉन्ग टर्म Debt मार्किट तथा शार्ट टर्म Debt मार्किट। जब भी Debt Securities में एक साल से कम की Maturity के लिए कोई ट्रेड होता है तो इसे Money Market Transaction के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार जब Debt Securities में एक साल से ज्यादा की Maturity के लिए कोई ट्रेड होता है तो इसे एक Bond Transaction के नाम से जाना जाता है। RBI MOnetary Policy  दोनों को ही कहीं न कहीं प्रभावित करती है। तो आइये जरा RBI Monetary Policy के Bond Market पर प्रभाव के बारे में अध्ययन करते है –

Bonds का मतलब 

Bonds एक प्रकार से फिक्स्ड इनकम Debt Securities होती है जो विभिन्न प्रकार की Business Entities द्वारा निवेशकों से एक निश्चित समय तक कैपिटल रेज करने के काम आती है। Bond-Issuer इन्वेस्टर से यह वादा करता है कि वह Bond कि लाइफ के दौरान एक निश्चित इंटरेस्ट का भुगतान करेगा तथा साथ ही साथ इसकी Maturity पर Principal Amount या Face Value का भी भुगतान करेगा। Bonds मुख्यतः सरकार या फिर कॉर्पोरेट संस्थाओं या नगर पालिका या फिर अन्य Sovereign संस्थाओं द्वारा भी जारी किए जा सकते है।

बांड रिटर्न्स क्या है?

Bonds में एक इन्वेस्टर को मिलने वाले रिटर्न को Bond Yield के नाम से जाना जाता है। Bond में मिलने वाले रिटर्न को कैलकुलेट करने के लिए हम Bond Coupon payment (Bond पर मिलने वाली Interest Rate) को Bond की face Value से भाग दे देते है। इसको Coupon Rate के नाम से भी जाना जाता है।

Coupon rate = Total Annual Coupon Payment / Par Value of Bond * 100%

अगर हम Bond Yield की कैलकुलेशन में और गहराई से जाना चाहते है तो इसमें पैसे की टाइम वैल्यू को शामिल किया जा सकता है तथा कंपाउंडिंग इंटरेस्ट पेमेंट को भी शामिल किया जा सकता है। इसके बाद हमें कई प्रकार की Yields मिल जाती है जैसे – yield to maturity (YTM), bond equivalent yield (BEY), and effective annual yield (EAY).

Bond Yield तथा Bond Price के बीच रिलेशनशिप 

Bond Yield तथा Bond Price के बीच Inverse रिलेशन होता है अर्थात Bond की कीमत कम होने से Yield में वृद्धि होती है तथा इसका उल्टा भी सही है।

आइये एक सरल उदाहरण से इसको समझते है – माना कि आप एक Rs 1000, 10% Bond को 5 साल की Maturity के साथ होल्ड करते है। इसका मतलब यह हुआ कि आप 5 साल तक प्रति वर्ष 100 रूपये (1000 का 10% ) का रिटर्न पाएंगे तथा Maturity पर 1000 रुपये आपको मिल जाएंगे। अगर Interest Rate 10% से ज्यादा जाती है तो इसका मतलब Bond की कीमत में गिरावट आएगी। इसलिए आप उस Bond को  बेचने का फैसला करते है। माना कि इसी प्रकार के निवेश पर आपको 13% सालाना रिटर्न मिल रहा है तो ऐसी स्थिति में आपके द्वारा होल्ड किया गया बांड अन्य निवेशकों को भी आकर्षित नहीं कर पाता क्योंकि यह एक साल में केवल 100 रुपये का Interest देगा जबकि इसी प्रकार से इन्वेस्टमेंट से आपको 130 रुपये का Interest भी मिल रहा है।

RBI Monetary Policy क्या है?

RBI की Monetary Policy यह सुनिश्चित करती है कि देश में होने वाले पैसे की सप्लाई को RBI किस प्रकार से कंट्रोल करती है। यह Interest रेट को भी नियंत्रित करती है जिससे Price Stability बनी रहे तथा ज्यादा इकोनॉमिक ग्रोथ हो सकें।

RBI Monetary Policy हकीकत में Bond की कीमत को किस प्रकार से प्रभावित करती है 

जैसा कि हमने पहले भी पढ़ा था कि RBI की Interest Rate तथा Bond की कीमतों के बीच एक Inverse रिलेशनशिप होती है। इसका मतलब ये हुआ कि जब Interest Rates में बढ़ोतरी होती है तो Bond price में कमी होती है।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हकीकत में यह प्रक्रिया कैसे होती है? तो आइये एक सरल उदाहरण से इसको समझते है –

माना कि आप एक 10% bond को होल्ड करते हो जिसकी Maturity 5 साल की है। अगर RBI Interest Rates को 2% से कम कर देती है तो आपको एक Bondholder के तौर पर 8% रिटर्न तो मिल ही जाएगा लेकिन एक नया Bondholder इससे 2% कम रिटर्न प्राप्त करेगा। इसी को मेंटेन करने के लिए Bond की कीमत ज्यादा हो जाती है तथा Yield to Maturity (YTM) मार्किट लेवल पर मेन्टेन रहती है।

आइये एक और उदहारण की बात करते है। माना आपने एक गवर्नमेंट बॉन्ड (G-sec) होल्ड कर रखा है। अगर Interest रेट्स में गिरावट हो रही है तो इसकी वजह से Price में बढ़ोतरी होगी और आपको Capital Appreciation के कारण फायदा मिल जाएगा। इसीलिए जब भी Interest Rates में गिरावट आती है तो सरकारी बॉन्ड अन्य बांड्स की अपेक्षा अच्छी परफॉरमेंस दिखाते है। लम्बी अवधि के बॉन्ड्स उस स्थिति में भी अच्छी परफॉरमेंस दिखते है जब Interest rates में गिरावट देखी जाती है।

बॉन्ड्स की डिमांड तथा सप्लाई का खेल 

सरकारी बॉन्ड्स के मुख्यतः 2 Buyers होते है – Banks तथा  foreign portfolio investors (FPIs)  ये दोनों Buyers ही अपने निर्णय लेने से पहले Interest Rates तथा Yields का जरूर एनालिसिस करते है। आइये थोड़ा विस्तार से समझते है –

Banks –

Banks मुख्यतः उस कंडीशन को पसंद करते है जब Interest Rates में गिरावट हो क्योंकि इसकी वजह से Capital Appreciation का फायदा उनको मिल जाता है। इसकी वजह से बैंक्स ट्रेज़री प्रॉफिट भी बुक कर लेते है। जब रेट्स में गिरावट हो तो सरकार कम Yield पर  भी Debt Raise कर सकती है।

Foreign Portfolio Investors (FPIs) –

FPI का बॉन्ड के प्रति रुझान इन दो बातों पर निर्भर करते है –

  • Indian Benchmark Yield :

अमेरिका जैसे Matured मार्किट के बजाय FPI भारतीय Yield की और ज्यादा आकर्षित होते है। US Benchmark Yield की तुलना में भारतीय बॉन्ड्स प्रीमियम पर ट्रेड करते है। इसकी वजह से ही FPI भारतीय बॉन्ड्स की और आकर्षित होते है।

  • Currency Outlook :

Monetary Policy के अंतर्गत करेंसी पर पड़ने वाले प्रभाव को भी FPIs अच्छे से विश्लेषित करते है। US Benchmark की तुलना में भारतीय बॉन्ड्स का प्रीमियम पर ट्रेड होना तभी लाभदायक रहेगा जब INR तथा USD के बीच एक स्टेबिलिटी हो।

COVID-19 का बॉन्ड मार्किट पर प्रभाव –

बहुत सारे Initiatives तथा प्रयासों के बाद भी भारतीय बॉन्ड मार्किट की उतनी उन्नति नहीं हुई है। भारतीय GDP के 20% से भी कम हिस्से में इसका योगदान रहता है वहीं US में यह नंबर 120% है। लेकिन भारतीय बॉन्ड मार्किट लगातार प्रोग्रेस कर रहा है तथा भविष्य में इसमें काफी विकास होने की संभावना है।

कोरोना नामक महामारी के कारण अनेक निवेशकों का आकर्षण इक्विटी की बजाय बॉन्ड्स की तरफ बढ़ा है तथा इसके परिणामस्वरूप बांड्स की प्राइस में काफी ज्यादा बढ़ोतरी देखी गयी। भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ को और ज्यादा गति देने के लिए RBI ने रेट्स में कटौती कर दी जिसकी वजह से बॉन्ड्स की कीमतों में वृद्धी हुई तथा Yields में गिरावट देखने को मिली।

निष्कर्ष –

अगर हम थोड़ा अच्छे से विश्लेषण करे तो हम पाएंगे कि RBI की Monetary Policies का बॉन्ड मार्किट पर काफी प्रभाव होता है। यह प्रभाव हमें कई रूपों में देखने को मिल सकता है जैसे Rates में परिवर्तन, Securities की LIquidity में परिवर्तन, रिस्क मैनेजमेंट आदि। वर्तमान में चल रही महामारी की वजह से Monetary Policies में भी काफी परिवर्तन देखने को मिले है तथा इसने बॉन्ड मार्किट को भी प्रभावित किया है।

हम आशा करते है कि इस आर्टिकल के माध्यम से आपको बॉन्ड मार्केट के बारे में काफी नई जानकारी सीखने को मिली होगी।

धन्यवाद !!

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